कावड़ यात्रा
👉 🔱 कावड़ यात्रा 🔱 👈
👉हर साल श्रावण मास में लाखों की तादाद में कांवडिये सुदूर स्थानों से आकर गंगा जल से भरी कांवड़ लेकर पदयात्रा करके अपने गांव वापस लौटते हैं
👉इस यात्राको कांवड़ यात्रा बोला जाता है।
श्रावण की चतुर्दशी के दिन उस गंगा जल से अपने निवास के आसपास शिव मंदिरों में शिव का अभिषेक किया जाता है। कहने को तो ये धार्मिक आयोजन भर है, लेकिन इसके सामाजिक सरोकार भी हैं।
कांवड के माध्यम से जल की यात्रा का यह पर्व सृष्टि रूपी शिव की आराधना के लिए हैं।
पानी आम आदमी के साथ साथ पेड पौधों, पशु - पक्षियों, धरती में निवास करने वाले हजारो लाखों तरह के कीडे-मकोडों और समूचे पर्यावरण के लिए बेहद आवश्यक वस्तु है।
👉उत्तर भारत की भौगोलिक स्थिति को देखें तो यहां के मैदानी इलाकों में मानव जीवन नदियों पर ही आश्रित है।
👉हमारे शास्त्रों में मनुष्य जीवन को अति दुर्लभ बताया है। मनुष्य जीवन पाकर मानव भक्ति नहीं करता वह जीवन को बर्बाद करता है।
गीता वेद और पुराणों में कांवड़ लाना और गंगा का जल शिवलिंग पर चढ़ाने का कहीं कोई प्रमाण नहीं होने से यह मनमाना आचरण सिद्ध हुआ। शिवजी भी शास्त्रविरूद्ध साधना कांवड़ यात्रा से प्रसन्न नहीं हैं। हर साल कांवड़ यात्री दुर्घटना, आपदा आदि के शिकार हो जाते हैं।
शिवजी को प्रसन्न करने की भक्ति अर्थात वो यथार्थ मंत्र जिसके जाप से शिव जी प्रसन्न होकर साधक देते हैं, वह भक्ति मंत्र तत्वदर्शी सन्त बताते हैं उनसे जाकर सुनो (गीता अ4, श्लोक34)
ऐसी ही एक साधना सावन के महीने में कांवड़ यात्रा होती है। कांवड़ यात्रा करने का किसी भी शास्त्र में प्रभु का निर्देश नहीं है। कांवड़ यात्री सैकड़ों हजारों किलोमीटर पैदल चलकर गंगा जल लाते हैं। उनके पैरों तले करोड़ों सूक्ष्म जीव मरते हैं। यह काल का एक सुनियोजित जाल है। बरसात के दिनों में अनेक सूक्ष्मजीव बिलों से बाहर निकल धरती पर आ जाते हैं ऐसे में कांवड़ यात्री पुण्य कमाने के उद्देश्य से पैदल चलता है तो उनके पैरों के नीचे करोड़ों सूक्ष्मजीव मर जाते हैं जिसका पाप उनके सिर पर रखा जाता है। कबीर साहिब ने कहा है:- करत है पुण्य, होत है पापम् ।
वह पुण्य कमाने शिवजी को प्रसन्न करने चला था और करोड़ों जीव हत्या का पाप अपने सिर ले आया।
वर्तमान में सतगुरु रामपाल जी महाराज सभी धर्मशास्त्रों गीता वेद एवं संतों की वाणियों से प्रमाणित भक्ति विधि बता रहे हैं जिससे साधक को अद्भुत भौतिक और आध्यात्मिक लाभ हो रहे हैं।
अत: प्रिय मानव समाज से निवेदन है शास्त्रविरूद्ध साधना त्यागें और शास्त्र अनुकूल साधना ग्रहण करें।
इससे मानव जीवन का कल्याण सुनिश्चित होगा।
देखिए शास्त्र प्रमाणित सत्संग-
“साधना चैनल” प्रतिदिन रात्रि 7:30 से 8:30″





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